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दिवाली साल में एक ही बार आती है

दिवाली साल में एक ही बार आती है और मुझे यह बात पता है। मुझे यह न बताएं। ज़िन्दगी भी एक ही बार मिलती है न? ये बताया है कभी किसी ने आपको? पृथ्वी एक ही है, यह बताया है किसी ने आपको?
दिवाली मनाने से आपको किसी ने नहीं रोका है। बस इतनी सी विनती है कि पर्यावरण का ख्याल रख कर दिवाली मनाएं। जब मैंने अपने खुद के दोस्तों को दिवाली की शुभकामनाएं दीं और बोला कि इस दिवाली पटाखे नहीं, तो उनमें से कई ने मुझे जवाब दिया 'साल में एक ही बार तो आती है', 'एक दिन से क्या हो जाएगा?' एक दिन से बहुत कुछ हो जाता है। आज अगर हमने इस बात का ध्यान नहीं दिया तो अगले 20 साल के अंदर हम सब ऑक्सीजन मास्क्स लगाकर घूम रहे होंगे। 
सच कहूं तो मुझे बहुत गुस्सा आता है जब मैं लोगों के ऐसे जवाब सुनती हूँ। एक को तो जब मैन ये सब बोला तो उसने मुझे जवाब दिया 'tum mature hogyi hogi toh ni jalati, jab hum mature ho jayenge hum bhi chor denge' ऑक्सीजन मास्क्स वाली बात पर बोला 'let them die'। शर्म आती है ऐसे लोगों से मुझे रिश्ता रखने में भी। लोगों का ये भी जवाब रहता है कि भारत में हमेशा से ऐसे ही दिवाली मनाई जाती है। माफ करियेगा पर आपलोगों की हिस्ट्री थोड़ी कमज़ोर है।
भारत म पहले कभी पटाखे नहीं जलाये जाते थे। पटाखों का रिवाज इस नई "so called modern and advanced" दुनिया की देन है। पहले के ज़माने में लोग शहर में, बड़े घरों में या बिल्डिंग में नहीं रहते थे। लोग जंगलों में रहते थे। उस ज़माने में दिवाली पर घरों को दिए से सजाया जाता था और उस समय में बर्तन लेकर उससे आवाज़ की जाती थी। क्यों? क्योंकि जंगलों में जानवर आते थे। लोग त्योहार में व्यस्त रहते थे और डर था कि अगर रात में मिलने के लिए घर से निकले तो जानवर उनपर हमला न करें। जानवरों से बचने के लिए बर्तन पीट कर आवाज़ें निकाली जाती थीं। उन आवाज़ों का यह नया आविष्कार है... पटाखे। परंतु ये पटाखे आवाज़ के साथ साथ काफी हानिकारक गैस छोड़ते हैं। ये गैस हमारे लिए काफी हानिकारक है और ये बात पता नहीं हमलोग कब समझेंगे। शायद जब मौत के दरवाजे पर होंगे तब? अब शायद आपको यह भी पता चल गया होगा कि धनतेरस पर बर्तन खरीदने का रिवाज क्यों है। 
इस पोस्ट के बाद भी शायद बहुत लोग मुझे वही जवाब देंगे कि साल में एक ही बार तो आती है दिवाली लेकिन वो लोग मेरा भी जवाब याद रखें "ज़िन्दगी भी तो एक ही बार मिलती है"। मुझे सच में नहीं पता कि लोग अपनी सोच इस पोस्ट के बाद बदलेंगे या नहीं, लेकिन मैं ये पोस्ट इसी उम्मीद में लिख रही हूँ कि शायद लोग समझें। 
दिवाली मनाने के कुछ और भी अच्छे तरीके हैं। आप मिल बाट कर खाइये। गरीबों को खाना और कपड़े दिजीये। जो खाना और मिठाई आप फेक देते हैं वो खाना और मिठाई किसी ऐसे को दिजीये जिसकी दिवाली उस दिन मनती है जिस दिन घर में रोटी के साथ खाने के लिए थोड़ी सी सब्ज़ी मिल जाये। दिवाली अपने परिवार के साथ समय बिताकर और हँस बोलकर मनाइये। यह मोह छोड़ दिजीये कि एक दिन से क्या हो जाएगा। एक दिन से बहुत कुछ हो सकता। जैसे एक दिन में कोई मर जाता और जैसे एक दिन में किसी की जान बच जाती। वैसे ही एक दिन में 'क्या-क्या' हो जाएगा, यह याद रखिये। 
दिवाली की शुभकामनाएं आपको और आपके परिवार को। 
सना
Sana

Comments

  1. बहुत अच्छा लिखा है सना. तुमने सही लिखा है कि पहले भारत में पटाखों का इस्तेमाल नहीं होता था.

    पटाखों में जिस बारूद का इस्तेमाल होता है उसका सबसे पहले 1526 में भारत में बादशह बाबर ने इब्राहीम लोदी के ख़िलाफ़ युद्ध में किया था.

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